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                                            माँ माँ ममता की मूरत होती हैं माँ हमें इतना प्यार करती हैं तो फिर भी हम  उनको दुःख क्यों देते हैं। माँ हमे चाहिए वो देती है फिर भी हम उनके लिए कुछ नही कर सकते क्या? माँ को जन्नत का दर्जा दिया जाता हैं लेकिन क्या हम माँ से इतना प्यार करते हैं? माँ नऊ महीने हमे अपने कोक में रखकर  पैदा करती हैं।फिर भी क्या हमें उनका दुःख दिख सकता है? आज भी माँ को घर से बाहर निकाला जाता है। सिर्फ एक मामुली लडकी के लिए जिसे  आप बेशुमार प्यार करते हो। मैं कहती हूँ।माँ जिस तरह आप को मुश्किलों में मदत करती है।वैसे कोई भी  आपकी प्रेमिका ।साथ नही दे सकती है। माँ सबसे बड़ी किंमती मूल्यवान वस्तु हैं उसे छुपाकर रखो ।घर से निकालकर  नही  बल्कि दिल में छुपाकर रखो। माँ को इतना प्यार दो ।कि सारी  कायनात आपके सोच में पड जाए। माँ ही एक ऐसी मूरत है।जो आपका  जीवन सु...
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                          देवदासी की आत्मकथा मैं एक देवदासी ।मेरा नाम अंगुलिका है।मैं उत्तर प्रदेश की रहिवासी हूँ।जब मुझे पता चला की मुझे देवदासी बनाया गया तो मैं बहुत खुश थी।हररोज भगवान को नमन करती लेकिन अचानक कुछ ऐसी घटना घटी की देवदासी जैसे बनना जैसे मेरे लिए श्राप बन गया। उस दिन ऐसा हुआ की माँ देर रात मंदिर में भगवान को नमन करके वही सो गई।तो अचानक कुछ लड़कों ने मुझे उठाकर गाडी में डालकर कई अन्य देश में लेकर चले गए।जब मुझे उस घर में रखा तभी मेरे जैसे लडकिया बहुत थे। वे लोग तहसनहस हो गए थे।वही अचानक मेरी मामी की लडकी वहाँ दिखी।हमे लगा था की वह किसी के साथ भागकर चली गई।तभी मैंने उसे पूछा,"तुम यहाँ क्या कर रही हो?ये लोग कौन है?तभी मामी की लड़की ने कहा कि ये लोग भगवान के नाम लेकर लड़कियों  का वैस्या व्यवसाय करने के लिए कहते हैं। यह सुनकर मैं अवाक रह गई।मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।इस चुंगुल से कैसे बचे।एक दिन मैं उस धंदे से भाग गई और अपने घर परंतु वहा मैंने देखा कि वही लोग मेरे माँ पिताजी को पै...
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                                        भूख एक गरीब परिवार था।जिसमें दस लोग थे। माँ, बाप और उनके आठ बच्चे।ज्यादा बच्चे होने के कारण बाप अपने बच्चों का पेट नही भर सकता था। वे गरीब होने के कारण  कोई उनको काम पर भी नही रखते थे।परंतु एक दिन अचानक उनके पिताजी का देहांत हो जाता है। बच्चे भिक मांग मांगकर माँ गुब्बारे बेचकर अपना गुजारा करते थे। लेकिन उनके घर में भूख का अकाल पड जाता है।सभी एक दूसरे पर मारने के लिए उतर पडे । एक दिन अचानक उनके पड़ोसिया उनकी हालात देखकर हररोज बचा हुआ खाना उनको लाकर देते। परंतु अचानक 8 साल का लडका मर जाता है। तब एक छोटीसी नौ साल की लडकी अपनी माँ से कहती है कि माँ हम भूखे नही रहेंगे।हमे अभी बहुत सारा खाना मिलेगा।परंतु माँ मेरा  छोटा भाई इतना बीमार है वह कब मरेग,मुझे बहुत भूख लगी हैं। क्या यही है वो हमारा भारत जहाँ गरीब बच्चे ,बूढे अभी भी खाना खाने के लिए तरस रहे हैं।भूख के लिए तरस रहे हैं। महात्मा गांधी जी ने सही कहा है कि........
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                                           दादा               भूख चेहरे पे लिए ,चांद से प्यारे बच्चे।               बेचते फिरते हैं गलियों में गुब्बारे बच्चे।। "दादा ओ दादा चला आम्ही कामावर जाऊया "रमेश ने अपने भाई राकेश से कहा।भाई कहता है-"अरे जाकर क्या करेंगें कोई एक भी गुब्बारा ख़रीदता नही और खरीदेगे तो भी,एक या दो।रमेश यह सुनकर उदास हो गया।इनको भाई के सिवा इस दुनिया में कोई भी नहीं था। सावन का महीना था।बहुत जोरों से बारिश हो रही थी।हवा जोर-जोरों से बह रही थी।रमेश का घर छुट्टे का था।इसलिए उनके घर में पानी भर गया।उनकी छत भी अच्छी  नही थी।उसका बडा भाई अपने छोटे भाई से बहुत प्यार करता था।राकेश ने अपने भाई को उठाकर एक इमारात के अंदर लेकर गया और उसे सुला दिया और अपने घर जाकर सारे गुब्बारे कपडे लेकर उसी इमारत में आया।रमेश को भनक  तक नही लगने दी कि वह बारिश में भीगकर सारे गुब्बारे लेकर आय...
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                                  वह गरीब क्यों?                 गरीबी उस लाचारी का नाम है, जो अमीरों के पैरों तले दबी हुई है। गरीबी उस बदनसीब का नाम है, जो महँगे चीजों के सपने देखना भी एक तरह की सजा है। वह गरीब इतना गरीब क्यों है? वह अमीर इतना अमीर क्यों है? वह गरीब क्यों भूख से तड़पता है? रात में सड़क के किनारे थंड में सोता है। वह गरीब क्यों भूख लगने पर देर रातों तक मुँह दबाकर रोता है? क्या यही वो हिन्दुस्तान है? जहाँ एक समानता का राज है? About:-  This is my second post. This poem is about the miserable life of poor people who suffers a lot due to poverty.Inequality still exist In our society .There is need to eradicate poverty and feel the gap between the rich and poor. 
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                                 ** अनोखा फरिश्ता** "अरे भय्या, प्लास्टिक बैग ले लो ना! बहुत दिनों से कुछ खाया नहीं। बहुत भूख लगी है। खाने के लिए पैसे नही है।ओ.............. भय्या ले लो ना। सिर्फ दो आने का है। "यह कहकर मिना रोने लगी। मिना की दुःख भरी कहानी है। उसकी कहानी सुनकर मानो दुःखो का एहसास होगा। कहानी शुरु होती हैं जो कर्नाटक के बीजापुर नामक एक छोटे से गाँव की निवासी।वह अपने परिवार के साथ गोवा में प्लास्टिक के व्यापार के लिए आयी थी। उस समय उनके पास ना ही घर था और ना ही खाना खाने के लिए पैसे।मिना की माँ दूसरों के घर -घर जाकर झाडू पोंछा, बरतन धोने का काम करती। मिना और उसके माँ -बाप रोज की तरह फुटपाथ पर सोते थे। कई लोग इन्हें फटकारते थे, गालियाँ भी देते थे। मिना को यह सब देखा नहीं जाता। वह ऐसे मानों मर्रा  की जिंदगी खुशी से जिति थी। वह कहते है ना........  "गरीबों की बस्ति में जरा जाकर तो देखो,  वहाँ बच्चे भूखे तो मिलेंगे, मगर उदास नहीं."..... ठीक उसी तरह मिना भी वह अपने जिंदगी से ज...