** अनोखा फरिश्ता** "अरे भय्या, प्लास्टिक बैग ले लो ना! बहुत दिनों से कुछ खाया नहीं। बहुत भूख लगी है। खाने के लिए पैसे नही है।ओ.............. भय्या ले लो ना। सिर्फ दो आने का है। "यह कहकर मिना रोने लगी। मिना की दुःख भरी कहानी है। उसकी कहानी सुनकर मानो दुःखो का एहसास होगा। कहानी शुरु होती हैं जो कर्नाटक के बीजापुर नामक एक छोटे से गाँव की निवासी।वह अपने परिवार के साथ गोवा में प्लास्टिक के व्यापार के लिए आयी थी। उस समय उनके पास ना ही घर था और ना ही खाना खाने के लिए पैसे।मिना की माँ दूसरों के घर -घर जाकर झाडू पोंछा, बरतन धोने का काम करती। मिना और उसके माँ -बाप रोज की तरह फुटपाथ पर सोते थे। कई लोग इन्हें फटकारते थे, गालियाँ भी देते थे। मिना को यह सब देखा नहीं जाता। वह ऐसे मानों मर्रा की जिंदगी खुशी से जिति थी। वह कहते है ना........ "गरीबों की बस्ति में जरा जाकर तो देखो, वहाँ बच्चे भूखे तो मिलेंगे, मगर उदास नहीं."..... ठीक उसी तरह मिना भी वह अपने जिंदगी से ज...